मैं समय हूँ तो क्या ?
किसी से कुछ छिनने का ख्याल
या यूँ हीं चलते हुए ले लेने का ख्याल
कभी नहीं आया .
दिया तो पूरे मन से दिया
मीठे को मीठा ही रहने दिया
कड़वे को कड़वा ....
लेने में पूरा विश्वास रहा
सुनने में पूरा विश्वास रहा
मानने में पूरा विश्वास रहा
कुछ चेहरों को मैंने झूठ से परे जाना
पर वे देखते देखते सच से परे हो गए
और .......
कुछ बेचैनियाँ शब्दों की गिरफ्त से
बाहर होती हैं
लाख दर्द हो
आलोचनाओं का शिकार होती हैं
और ....
तब लगता है
काश छाछ को फूंककर ही पीया होता !........
ज़िन्दगी कभी एक गीत नहीं गाती , कभी भाव बदलती हैं , कभी धुन बदलती है ... कभी बिल्कुल बेसुरी . जाने क्या देखना चाहती है , क्या समझाना चाहती है !
उसकी अदा वही जाने , अपनी अदा में मैंने कहा है ...
मैं गुनगुनाती हवा थी
गुनगुनाती हवा हूँ
और .... रहूंगी ....
परिस्थितियाँ यदि अपना स्वभाव नहीं बदलतीं
तो मैं क्यूँ बदलूं !
पटकने दो सर इन परिस्थितियों को
... पता चलेगा कि किससे पाला पड़ा ...
कहते हैं - मन के हारे हार है
मन के जीते जीत
.... और मैं मन से कभी नहीं हारती .
परिस्थितियों की पकड़ तो मौत तक होती है
पर अगर परिस्थितियाँ चूक गईं
तो हमारी पकड़ का अंदाजा उसे नहीं ...
सुना है- समय बड़ा बलवान ..
पर सब दिन होत न एक समान -
यह भी सुना है ...
अचानक आँधियाँ आती हैं ... बड़े जोर से
तो अचानक थमती भी हैं ...
छतें उड़ जाती है, दीवारें गिर जाती हैं
पेड़ उखड़ जाते हैं ...
पर जब आँधी रूकती है
तो कई विकल्प सामने होते हैं ...
क्यूँ भूल जाते हो
भगवान् छप्पड़ फाड़कर ही कुछ देता है
प्रतिकूल परिस्थितियों में ही
अनुकूल सबक मिलते हैं ...
परिस्थितियाँ हमें डराती ही इसीलिए हैं
कि हम निडर हो जाएँ ...
तो मैं निडर हो गई
यह विश्वास प्रबल हुआ
कि ऊपरवाला कभी साथ नहीं छोड़ता
तभी ... हाँ तभी
मैं गुनगुनाती थी ज़िन्दगी के गीत
गुनगुनाती हूँ
गुनगुनाती रहूंगी ....
हार ही गए तो फिर जीने का अर्थ क्या ? सबके अपने हादसे होते हैं और उन हादसों से परे होता है एक चिराग अलादीन का .... मैं यूँ हीं नहीं कहती ,
.....
मेरे पास है एक मासूम बच्चे सा मन
अनुभवों का आकाश
हौसलों से भरा विराट जादुई पंख
जिसे कितना भी काटो
वह खुद को पूर्ववत कर लेता है
मेरे पास हैं आम साधारण मंत्र
जो कभी भी
कहीं भी
तुम्हारी रक्षा कर सकते हैं
एकलव्य की आस्था
कर्ण की सहनशीलता, दानवीरता
अर्जुन की निष्ठा
प्रह्लाद सी निडरता
छलरहित दिमाग
गलत विरोधी कदम
सच कहने का अदम्य साहस ......
इस नज़रिए को ज़िन्दगी बना लो
तो सही मायनों में जी सकोगे
आँधियाँ कितनी भी आएँ - जूझ सकोगे ...
....
मैं ये नहीं कहती
कि आँखों से आंसू नहीं बहेंगे
यकीनन बहेंगे
.... वो ना बहे तो अन्दर की बेतरतीबी
सुलझेगी कैसे !
मैं ये भी नहीं कहती
कि रातों को जागोगे नहीं
यकीनन जागोगे
करवटें बदलोगे
.... ये न हुआ तो ठोस निर्णय
ले कैसे सकोगे ?
मेरे पास अनुभवों का एक खजाना है
जो कभी खाली नहीं होगा
तुम बस चाहना
....... जो चाहोगे वही मिलेगा !
टिपिर टिपिर प्रश्नों भरी आँखों से मत देखो .... तुम , मैं - हम सब सिर्फ खुद को सोचते हैं , और जब मौका मिला प्रभु को कटघरे में डाल दिया . प्रभु की भी तो सुनो ---
हाथ जोड़े सबने मुझे गुनहगार बनाया
सवालों के समंदर की लहरों से खींचा
किनारे से आगे जाकर छोड़ा ....
मैं क्या जवाब दूँ
और क्यूँ जवाब दूँ
प्रश्न तो मेरे अनुत्तरित हैं !
सब अपने मन की दशा कहते हैं
कभी मेरे मन को जिया है?
क्या सिर्फ माँ यशोदा ने खोया मुझे
या मेरे दिमाग में भी सन्नाटों की खरोंचे हैं !
तुम सबने मुझे बालक से भगवान् बना
मुझे सामर्थ्यवान कहा
राधा की पीड़ा उसके आंसुओं में सबने देखी
मेरे एकांत की खामोशी से सब अनजान रहे / बने !
तुम सब अपनी पुरानी चीज
बचपन का आँगन देख किलकते हो
पर मुझे पत्थर बना दिया
शिकायतों का अर्घ्य लिए ....
तुम सबने मुझे सर्वशक्तिमान बनने पर मजबूर किया
त्राहिमाम त्राहिमाम ' कहते हुए
मुझे युद्ध की अग्नि में झोंक दिया
संहार संहार संहार ...
मैं जिया ही कब ?
और अब
बेशुमार प्रश्नों की भरमार !!!
.......
क्या मैंने राधा को ही अपना नाम नहीं दिया ?
गोपिकाओं के पास ऊधो को नहीं भेजा ?
क्या मैंने अपने शयन कक्ष में
गोकुळ से परे कुछ सोचा ?
१४ वर्ष की आयु से ( सच कहूँ तो जन्म से )
मुझे तूफानों के मध्य देखकर
तुम जय जयकार करते रहे
और जब तूफ़ान शांत हुआ
तो प्रश्नों की पाण्डुलिपि मुझे सौंप दी !!!
...........
मैंने कब कहा मुझे भगवान् कहो
मेरी आराधना करो ?
यदि गीता सार के बदले
पूतना ,कंस ....... द्रौपदी , कौरवों के क्षय के बदले
मुझे कुछ दे सकते हो
तो मुझे यशोदा का लाल रहने दो
राधा का कृष्ण रहने दो
पूरे संसार के बदले
गोकुळ मेरे नाम कर दो ... मुझे मुक्त करो
वक़्त निकालो खुद से - सोचो उस चुप सी लड़की के बारे में , जिसकी चुप्पी के अलग अलग मायने तुम , मैं - हमसब निकालते रहते हैं , पर सच तो ये है -
वह चुप सी लड़की
जिसके अन्दर त्रिवेणी है
अलग अलग मन के सुर हैं
गंगा का प्रबल वेग
यमुना सा शांत रूप
सरस्वती सी लुप्त अनकही कहानी
जिसे सुनकर समझने की
किसी ने ज़रूरत नहीं समझी ....
रिश्ते , ख्याल, हँसी , प्यार ....
सबके बाद रह जाता है वह एहसास
जिसकी सांकल किसी के खटखटाने का इंतज़ार करती है ....
यह दरवाज़ा यूँ हीं नहीं खुलता
उसे प्रतीक्षा होती है उस झरने की
जो उंचाई से नीचे की तरफ गिरता है
शोर शोर शोर...
पर उस शोर से बेखबर लोग उसके वेग से खेलते हैं
तस्वीरें लेते हैं
चेतावनी भी देते हैं एक-दूसरे को
' उस तरफ़ गहराई अधिक है
खतरनाक है ---- बच के !'
................
चुप सी वह लड़की जानती है
उसके मन की त्रिवेणी की भाषा समझने के लिए
उसी गहराई की ज़रूरत है
जिससे आम व्यक्ति व्यवहारिक बना दूर रहता है !
..............................
एक इंतज़ार में वह पन्नों से खेलती है
कभी नाव , कभी तलवार
तो कभी गीत लिखती है
मासूम पंछी की तरह डाली डाली घूमती है
आहट तो है किसी के आने की
पथिक है या बहेलिया
पहचान की उधेड़बुन में होती है
हारती तो नहीं
पर अक्सर थक कर वह उस मुंडेर पर बैठ जाती है
जिससे वह कई सवाल करती है ....
............
सुनने में अजीब तो लगेगा
पर उस चुप सी लड़की को
खामोश मुंडेर से कई उत्तर मिल जाते हैं
और अपनी थकान भूल
वह मुंडेर की अनुभवी हथेली पर
गहरी नींद में सो जाती है
एक और कल के इंतज़ार में !!!.........
मैं भी गहरी नींद सोती हूँ , शब्दों के सपने सजाती हूँ और हर सुबह नई उर्जा से भर जाती हूँ .... छोटा सा घर शब्दों के नाम करती हूँ -
शब्द लहराकर हर तरफ जाते हैं
कोई रख देता है उसे रोटी में
कोई मटकी में
कोई बुहारकर निकाली गई धूल में
कोई टांग देता है कंदील संग
रात के अँधेरे में !
शब्द छुप जाते हैं
झांकते हैं दरवाज़े की ओट से
बिस्तर के नीचे से
खिड़कियों से
जागी आँखों सोयी आँखों से
उनींदे ख्यालों से ...
जब नहीं दिल करता उनके संग खेलने का
तो हठी की तरह
पालथी मार बिस्तर पर बैठ जाते हैं
सुबह की चाय के लिए ...
हर घूंट में भाव भरते हैं
फिर गीतों संग बहकते हैं ...
ये शब्द नाम बन जाते हैं
चेहरे में ढल
मुझसे बातें करते हैं
मेज पर पड़ी मेरी कलम
मेरी उँगलियों के बीच आ जाती है
या मुझे अपने बीच करती है
इससे अनजान मैं
उन्हें पिरोती हूँ , पिरोती जाती हूँ
वे मुझे आवाज़ देते हैं
कभी किसी की मटकी से
कभी रोटी से
कभी धूल से
कभी कंदील की रौशनी से .....
इस गहरे रिश्ते को
मैं गंवाना नहीं चाहती
इसलिए दौड़ती रहती हूँ इस छोर से उस छोर
निरंतर - ...
माथे से टपकती पसीने की बूंदों में भी
मुझे इनका साथ मिल जाता है
.... कौन आता है
कौन जाता है
ये परवाह नहीं करते
भरी भीड़ में भी ये मुझे खींच लेते हैं
घबराकर देखती हूँ - किसी ने देखा तो नहीं
!!!!!!!!!!!!!!
फिर ... निडर हो मैं इनको रेखांकित करती हूँ
फिर काव्य-संग्रह कहकर
एक छोटा सा घर बनाती हूँ
शब्दों के नाम !
शायद इसी एवज में ... शायद नहीं - निःसंदेह इसीलिए -
कल मेरे अनमने मन की मुलाकात ज़िन्दगी से हुई
सुसज्जित पुष्प आवरण में
खुशबू से आच्छादित
अप्रतिम सौन्दर्य लिए ....
सौन्दर्य ने मन की दशा ही परिवर्तित कर दी
लगा - बसंत तो कहीं गया ही नहीं है !
मुस्कुराती ज़िन्दगी की चपल आँखों ने कहा ,
कुछ कहना है या पूछना है ....
मन ने ज़िन्दगी की आँखों में गोते लगाए
जितने ख्वाब चुन सकता था - चुने
बेशुमार रंगों से रंग लिए
और टिमटिमाती ज़िन्दगी को छू छूकर देखा
बुदबुदाया -' ज़िन्दगी तो माशा अल्लाह कमाल की है
इसे कौन नहीं जीना चाहेगा !'
कई सवाल कुलबुलाये ....
पर ये ज़िन्दगी तो कई खेल खेलती है
...... दर्द का सिलसिला , भय का सिलसिला
हार का सिलसिला .... चलता है तो रुकता ही नहीं
शिकायतों का पुलिंदा लिए हम रोते जाते हैं
और ज़िन्दगी कानों में रुई डाले अनजान बनी रहती है ....
मन आगे बढ़ा... ज़िन्दगी के काँधे पर हाथ रखा
.... ज़िन्दगी फिर मुस्कुराई ,
आँखों को उचकाकर कहा - 'कहो भी ... '
मन ने संयत भाव लिए कहा -
" ज़िन्दगी तुम्हारे सौन्दर्य में तो
कहीं कोई कमी नहीं ....
जीने के हर खुले मार्ग हैं तुमसे जुड़े
व्यवधान का पुट कहीं दिखता ही नहीं
फिर जब हम तुम्हें जीते हैं
तो मार्ग अवरुद्ध कैसे हो जाते हैं !"
ज़िन्दगी ने मन का सर सहलाया
संजीवनी सी लहरें लहरायीं
मन देवदार की तरह हो ज़िन्दगी को सुनने लगा -
" मैं ज़िन्दगी हूँ
जन्म से मृत्यु के मध्य
मैं सिर्फ जीवन देती हूँ
तहस नहस करना मेरा काम नहीं
छल के बीज भी मैं नहीं बोती
विनाश से मेरा कोई नाता नहीं
मैं तो बस देती आई हूँ ...
अर्थ का अनर्थ
यह तो इंसानी दाव पेंच हैं ...
'इसी जीवन में सब होता है '
ऐसा कहकर इन्सान अपनी चालें चलता है
अपने स्वार्थ साधता है
सबकुछ तोड़ मरोड़कर
बढ़ाकर घटाकर
मायूसी से कहता है
'ज़िन्दगी के रंग ही अजीब हैं .... '
सच तो ये है
कि मेरे पास कुछ भी बेमानी नहीं
हर रंग की अपनी खासियत है
अगर इंसानी मिलावट ना हो ...
मैं तो सिर्फ राहें निर्मित करती हूँ
सेंध लगाना इंसानी फितरत है
किसी और को कटघरे में डालना भी
उसकी सधी चाल है .. .."
अनमना मन अनमना नहीं रहा
उसने बड़े प्यार से ज़िन्दगी के हाथ चूमे
लम्बी सी सांस ली
और मेरे पास आ गया
कहीं कोई सवाल शेष नहीं रहा ....
तो चलो ..... मेरी ऊँगली थाम लो , क्योंकि -
खामोशियों की चादरें
मैंने समेट दी हैं
चलो कहीं शोर करें ...
सो चुकी हैं संवेदनाएं
शिथिल हैं कर्तव्य सारे
चलो जागरण के गीत गायें ...
तय है - लोग बेरुखी से देखेंगे
कड़वे बोल बोलेंगे
बुरा नहीं ,
बहुत बुरा लगेगा
पर बीते दिनों को लौटाने का
और कोई रास्ता नहीं रहा
सोये रिश्तों को जगाने का
कोई विकल्प नहीं रहा ....
परेशान चेहरों की धुंध में
अपने भी बेगाने लगने लगे हैं
कभी पहचान मिले तो
अनजान बन गुजर जाते हैं
वक़्त ही वक़्त है
पर दिल नहीं
चलो एक धड़कता दिल ले आएँ
समझदारी के भारी भरकम चादर से निकलकर
कुछ बेवकूफाना हरकत करें
किसी खोये चेहरे से अकस्मात् पूछें -
'हुआ क्या है ' ...
चलो किसी चेहरे पर विश्वास की रेखा खींचें
अहम् की उपजाऊ धरती पर
दूरी के बीज डालना बन्द करो
इंतज़ार मत करो किसी के आने का
अपनी पुकार उसे दे दो
तरीका भी एक हद तक अच्छा लगता है
तरीके की जकड़न से निजात पाओ
खुलकर हंसो
बिना किसी विज्ञापन के
चेहरा चमक उठेगा ....
खिली खिली धूप में
खुली खुली साँसों में ही वजूद मिलेगा
तो चलो भी !
जब तक जीवन है क्रम है .... शेष , विशेष का क्रम चलता ही रहेगा , तलाश भी बनी रहती है ............... पूर्ण होना यानि मुक्त होना , और इस तलाश में अभी मुक्ति की चाह से प्रबल खुद की तलाश है ................... कुछ और तलाशूँ , तब तक के लिए एक अल्प विराम !!!