About Us



मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

27 May, 2012

खुद को पाना आसान नहीं !



खुद की तलाश
खुद के लिए होती है
क्योंकि प्रश्न खुद में होते हैं
ये बात और है
कि इस तलाश यात्रा में
कई चेहरे खुद को पा लेते हैं
................
अबोध आकृति
जब माँ की बाहों के घेरे में होती है
तब वही उसका संसार होता है
वही प्राप्य
और वही संतोष .... !
पर जब अक्षरों की शुरुआत होती है
साथ में कोई और होता है
प्रथम द्वितीय ..... का दृश्य होता है
तो ज्ञान में हम कहाँ हैं
इसकी तलाश होती है !
अजीब बात है -
सबसे कम अंक अज्ञानी हो - ज़रूरी तो नहीं
यह तो उस क्षण विशेष का सच है
प्रथम रटनतू हो सकता है
जो फेल है
वह उस वक़्त इस जीत हार से उदासीन हो
इसकी पूरी संभावना हो सकती है ...
अंक देने वाले की निष्पक्षता
और मनःस्थिति भी मायने रखती है
साथ ही उसका ज्ञान भी !
सीधे रास्ते ही हमेशा सही नहीं होते
राम के बदले मरा कहने में भी भक्ति है
असीम भक्ति -
फिर तलाश किस तरह निर्धारित हो !
अपने बारे में स्वयं से अधिक
कोई कैसे जान सकता है
पर अक्सर कोई और निर्धारित करने लगता है ...

किसी को
किसी को भी ...
और खुद को जानने के लिए
आत्मा की आँखें चाहिए !
जो जीकर भी मृत है
उसे किसी के लिए कुछ कहने का अधिकार नहीं
पर यह आखिर कैसे तय हो !
मैं सही
वो गलत - आखिर कैसे !
नहीं कह सकते .....
तो खुद को ही सही गलत मानकर
खुद के विचार से चलो
दूसरों को कारण मत बनाओ
मुझे भी मुक्त करो
खुद भी मुक्त हो जाओ ...
पर - यदि बढाते हो हाथ
तो विश्वास करना सीखो
असुर को देवता
देवता को असुर मान
जितने भी मंथन कर लो
न अमृत मिलेगा न विष ....... खुद को पाना आसान नहीं !

25 May, 2012

तलाश क्या है



यह तलाश क्या है
क्यूँ है
और इसकी अवधि क्या है !
क्या इसका आरम्भ सृष्टि के आरम्भ से है
या सिर्फ यह वर्तमान है
या आगत के भी स्रोत इससे जुड़े हैं ?
क्या तलाश मुक्ति है
या वह प्रलाप जो नदी के गर्भ में है
या वह प्रवाह
जिसका गंतव्य उसके समर्पण से जुड़ा है !
जन्म का रहस्य जानना है
या मृत्यु के बाद के सत्य से अवगत होना है
धरती से आकाश तक
कारण परिणाम के कई विम्ब हैं
कारण भी अनुत्तरित
परिणाम भी अनुत्तरित
सबकुछ महज एक अनुमान है
और अनुमान से तलाश ....
कहाँ संभव है !
इस तलाश में गर चेतन है
तो अवचेतन भी है
प्राण है
निष्प्राण गंतव्य भी है ...
प्रत्युत्तर में त्रिदेव भी खड़े हैं
निर्माण यज्ञ में
उनकी तलाश भी अधूरी रही है !
कमजोरी यदि तलाश के रास्ते अवरुद्ध करती है
तो ईश्वर भी कमज़ोर रहा है
स्नेह और भक्ति के आगे
गलत वरदान देता रहा है ...
गलत को सही करने में
उसके पैरों तले भी पृथ्वी डोली है
महारथी देवों ने भी त्राहिमाम के रट लगाए हैं
फिर ....
क्या उस अनादि
सूक्ष्म प्रभुत्व के कणों ने
मुझे तलाश का माध्यम बनाया है !
और ....
क्या मैं यानि तुम यानि हम
ब्रह्मांड हैं
और तलाश है इसे पूर्णतया पाने की ?

24 May, 2012

खुद की तलाश - 15



मैं समय हूँ तो क्या ?
किसी से कुछ छिनने का ख्याल
या यूँ हीं चलते हुए ले लेने का ख्याल
कभी नहीं आया .
दिया तो पूरे मन से दिया
मीठे को मीठा ही रहने दिया
कड़वे को कड़वा ....
लेने में पूरा विश्वास रहा
सुनने में पूरा विश्वास रहा
मानने में पूरा विश्वास रहा
कुछ चेहरों को मैंने झूठ से परे जाना
पर वे देखते देखते सच से परे हो गए
और .......
कुछ बेचैनियाँ शब्दों की गिरफ्त से
बाहर होती हैं
लाख दर्द हो
आलोचनाओं का शिकार होती हैं
और ....
तब लगता है
काश छाछ को फूंककर ही पीया होता !........

ज़िन्दगी कभी एक गीत नहीं गाती , कभी भाव बदलती हैं , कभी धुन बदलती है ... कभी बिल्कुल बेसुरी . जाने क्या देखना चाहती है , क्या समझाना चाहती है !
उसकी अदा वही जाने , अपनी अदा में मैंने कहा है ...

मैं गुनगुनाती हवा थी
गुनगुनाती हवा हूँ
और .... रहूंगी ....
परिस्थितियाँ यदि अपना स्वभाव नहीं बदलतीं
तो मैं क्यूँ बदलूं !
पटकने दो सर इन परिस्थितियों को
... पता चलेगा कि किससे पाला पड़ा ...

कहते हैं - मन के हारे हार है
मन के जीते जीत
.... और मैं मन से कभी नहीं हारती .
परिस्थितियों की पकड़ तो मौत तक होती है
पर अगर परिस्थितियाँ चूक गईं
तो हमारी पकड़ का अंदाजा उसे नहीं ...

सुना है- समय बड़ा बलवान ..
पर सब दिन होत न एक समान -
यह भी सुना है ...
अचानक आँधियाँ आती हैं ... बड़े जोर से
तो अचानक थमती भी हैं ...
छतें उड़ जाती है, दीवारें गिर जाती हैं
पेड़ उखड़ जाते हैं ...
पर जब आँधी रूकती है
तो कई विकल्प सामने होते हैं ...

क्यूँ भूल जाते हो
भगवान् छप्पड़ फाड़कर ही कुछ देता है
प्रतिकूल परिस्थितियों में ही
अनुकूल सबक मिलते हैं ...

परिस्थितियाँ हमें डराती ही इसीलिए हैं
कि हम निडर हो जाएँ ...
तो मैं निडर हो गई
यह विश्वास प्रबल हुआ
कि ऊपरवाला कभी साथ नहीं छोड़ता
तभी ... हाँ तभी
मैं गुनगुनाती थी ज़िन्दगी के गीत
गुनगुनाती हूँ
गुनगुनाती रहूंगी ....

हार ही गए तो फिर जीने का अर्थ क्या ? सबके अपने हादसे होते हैं और उन हादसों से परे होता है एक चिराग अलादीन का .... मैं यूँ हीं नहीं कहती ,
.....
मेरे पास है एक मासूम बच्चे सा मन
अनुभवों का आकाश
हौसलों से भरा विराट जादुई पंख
जिसे कितना भी काटो
वह खुद को पूर्ववत कर लेता है
मेरे पास हैं आम साधारण मंत्र
जो कभी भी
कहीं भी
तुम्हारी रक्षा कर सकते हैं
एकलव्य की आस्था
कर्ण की सहनशीलता, दानवीरता
अर्जुन की निष्ठा
प्रह्लाद सी निडरता
छलरहित दिमाग
गलत विरोधी कदम
सच कहने का अदम्य साहस ......
इस नज़रिए को ज़िन्दगी बना लो
तो सही मायनों में जी सकोगे
आँधियाँ कितनी भी आएँ - जूझ सकोगे ...
....
मैं ये नहीं कहती
कि आँखों से आंसू नहीं बहेंगे
यकीनन बहेंगे
.... वो ना बहे तो अन्दर की बेतरतीबी
सुलझेगी कैसे !

मैं ये भी नहीं कहती
कि रातों को जागोगे नहीं
यकीनन जागोगे
करवटें बदलोगे
.... ये न हुआ तो ठोस निर्णय
ले कैसे सकोगे ?

मेरे पास अनुभवों का एक खजाना है
जो कभी खाली नहीं होगा
तुम बस चाहना
....... जो चाहोगे वही मिलेगा !

टिपिर टिपिर प्रश्नों भरी आँखों से मत देखो .... तुम , मैं - हम सब सिर्फ खुद को सोचते हैं , और जब मौका मिला प्रभु को कटघरे में डाल दिया . प्रभु की भी तो सुनो ---

हाथ जोड़े सबने मुझे गुनहगार बनाया
सवालों के समंदर की लहरों से खींचा
किनारे से आगे जाकर छोड़ा ....
मैं क्या जवाब दूँ
और क्यूँ जवाब दूँ
प्रश्न तो मेरे अनुत्तरित हैं !

सब अपने मन की दशा कहते हैं
कभी मेरे मन को जिया है?
क्या सिर्फ माँ यशोदा ने खोया मुझे
या मेरे दिमाग में भी सन्नाटों की खरोंचे हैं !
तुम सबने मुझे बालक से भगवान् बना
मुझे सामर्थ्यवान कहा
राधा की पीड़ा उसके आंसुओं में सबने देखी
मेरे एकांत की खामोशी से सब अनजान रहे / बने !
तुम सब अपनी पुरानी चीज
बचपन का आँगन देख किलकते हो
पर मुझे पत्थर बना दिया
शिकायतों का अर्घ्य लिए ....
तुम सबने मुझे सर्वशक्तिमान बनने पर मजबूर किया
त्राहिमाम त्राहिमाम ' कहते हुए
मुझे युद्ध की अग्नि में झोंक दिया
संहार संहार संहार ...
मैं जिया ही कब ?
और अब
बेशुमार प्रश्नों की भरमार !!!
.......
क्या मैंने राधा को ही अपना नाम नहीं दिया ?
गोपिकाओं के पास ऊधो को नहीं भेजा ?
क्या मैंने अपने शयन कक्ष में
गोकुळ से परे कुछ सोचा ?
१४ वर्ष की आयु से ( सच कहूँ तो जन्म से )
मुझे तूफानों के मध्य देखकर
तुम जय जयकार करते रहे
और जब तूफ़ान शांत हुआ
तो प्रश्नों की पाण्डुलिपि मुझे सौंप दी !!!
...........
मैंने कब कहा मुझे भगवान् कहो
मेरी आराधना करो ?
यदि गीता सार के बदले
पूतना ,कंस ....... द्रौपदी , कौरवों के क्षय के बदले
मुझे कुछ दे सकते हो
तो मुझे यशोदा का लाल रहने दो
राधा का कृष्ण रहने दो
पूरे संसार के बदले
गोकुळ मेरे नाम कर दो ... मुझे मुक्त करो

वक़्त निकालो खुद से - सोचो उस चुप सी लड़की के बारे में , जिसकी चुप्पी के अलग अलग मायने तुम , मैं - हमसब निकालते रहते हैं , पर सच तो ये है -

वह चुप सी लड़की
जिसके अन्दर त्रिवेणी है
अलग अलग मन के सुर हैं
गंगा का प्रबल वेग
यमुना सा शांत रूप
सरस्वती सी लुप्त अनकही कहानी
जिसे सुनकर समझने की
किसी ने ज़रूरत नहीं समझी ....

रिश्ते , ख्याल, हँसी , प्यार ....
सबके बाद रह जाता है वह एहसास
जिसकी सांकल किसी के खटखटाने का इंतज़ार करती है ....
यह दरवाज़ा यूँ हीं नहीं खुलता
उसे प्रतीक्षा होती है उस झरने की
जो उंचाई से नीचे की तरफ गिरता है
शोर शोर शोर...
पर उस शोर से बेखबर लोग उसके वेग से खेलते हैं
तस्वीरें लेते हैं
चेतावनी भी देते हैं एक-दूसरे को
' उस तरफ़ गहराई अधिक है
खतरनाक है ---- बच के !'
................
चुप सी वह लड़की जानती है
उसके मन की त्रिवेणी की भाषा समझने के लिए
उसी गहराई की ज़रूरत है
जिससे आम व्यक्ति व्यवहारिक बना दूर रहता है !
..............................
एक इंतज़ार में वह पन्नों से खेलती है
कभी नाव , कभी तलवार
तो कभी गीत लिखती है
मासूम पंछी की तरह डाली डाली घूमती है
आहट तो है किसी के आने की
पथिक है या बहेलिया
पहचान की उधेड़बुन में होती है
हारती तो नहीं
पर अक्सर थक कर वह उस मुंडेर पर बैठ जाती है
जिससे वह कई सवाल करती है ....
............
सुनने में अजीब तो लगेगा
पर उस चुप सी लड़की को
खामोश मुंडेर से कई उत्तर मिल जाते हैं
और अपनी थकान भूल
वह मुंडेर की अनुभवी हथेली पर
गहरी नींद में सो जाती है
एक और कल के इंतज़ार में !!!.........

मैं भी गहरी नींद सोती हूँ , शब्दों के सपने सजाती हूँ और हर सुबह नई उर्जा से भर जाती हूँ .... छोटा सा घर शब्दों के नाम करती हूँ -

शब्द लहराकर हर तरफ जाते हैं
कोई रख देता है उसे रोटी में
कोई मटकी में
कोई बुहारकर निकाली गई धूल में
कोई टांग देता है कंदील संग
रात के अँधेरे में !
शब्द छुप जाते हैं
झांकते हैं दरवाज़े की ओट से
बिस्तर के नीचे से
खिड़कियों से
जागी आँखों सोयी आँखों से
उनींदे ख्यालों से ...
जब नहीं दिल करता उनके संग खेलने का
तो हठी की तरह
पालथी मार बिस्तर पर बैठ जाते हैं
सुबह की चाय के लिए ...
हर घूंट में भाव भरते हैं
फिर गीतों संग बहकते हैं ...
ये शब्द नाम बन जाते हैं
चेहरे में ढल
मुझसे बातें करते हैं
मेज पर पड़ी मेरी कलम
मेरी उँगलियों के बीच आ जाती है
या मुझे अपने बीच करती है
इससे अनजान मैं
उन्हें पिरोती हूँ , पिरोती जाती हूँ
वे मुझे आवाज़ देते हैं
कभी किसी की मटकी से
कभी रोटी से
कभी धूल से
कभी कंदील की रौशनी से .....
इस गहरे रिश्ते को
मैं गंवाना नहीं चाहती
इसलिए दौड़ती रहती हूँ इस छोर से उस छोर
निरंतर - ...
माथे से टपकती पसीने की बूंदों में भी
मुझे इनका साथ मिल जाता है
.... कौन आता है
कौन जाता है
ये परवाह नहीं करते
भरी भीड़ में भी ये मुझे खींच लेते हैं
घबराकर देखती हूँ - किसी ने देखा तो नहीं
!!!!!!!!!!!!!!
फिर ... निडर हो मैं इनको रेखांकित करती हूँ
फिर काव्य-संग्रह कहकर
एक छोटा सा घर बनाती हूँ
शब्दों के नाम !

शायद इसी एवज में ... शायद नहीं - निःसंदेह इसीलिए -

कल मेरे अनमने मन की मुलाकात ज़िन्दगी से हुई
सुसज्जित पुष्प आवरण में
खुशबू से आच्छादित
अप्रतिम सौन्दर्य लिए ....
सौन्दर्य ने मन की दशा ही परिवर्तित कर दी
लगा - बसंत तो कहीं गया ही नहीं है !
मुस्कुराती ज़िन्दगी की चपल आँखों ने कहा ,
कुछ कहना है या पूछना है ....

मन ने ज़िन्दगी की आँखों में गोते लगाए
जितने ख्वाब चुन सकता था - चुने
बेशुमार रंगों से रंग लिए
और टिमटिमाती ज़िन्दगी को छू छूकर देखा
बुदबुदाया -' ज़िन्दगी तो माशा अल्लाह कमाल की है
इसे कौन नहीं जीना चाहेगा !'
कई सवाल कुलबुलाये ....
पर ये ज़िन्दगी तो कई खेल खेलती है
...... दर्द का सिलसिला , भय का सिलसिला
हार का सिलसिला .... चलता है तो रुकता ही नहीं
शिकायतों का पुलिंदा लिए हम रोते जाते हैं
और ज़िन्दगी कानों में रुई डाले अनजान बनी रहती है ....

मन आगे बढ़ा... ज़िन्दगी के काँधे पर हाथ रखा
.... ज़िन्दगी फिर मुस्कुराई ,
आँखों को उचकाकर कहा - 'कहो भी ... '
मन ने संयत भाव लिए कहा -
" ज़िन्दगी तुम्हारे सौन्दर्य में तो
कहीं कोई कमी नहीं ....
जीने के हर खुले मार्ग हैं तुमसे जुड़े
व्यवधान का पुट कहीं दिखता ही नहीं
फिर जब हम तुम्हें जीते हैं
तो मार्ग अवरुद्ध कैसे हो जाते हैं !"

ज़िन्दगी ने मन का सर सहलाया
संजीवनी सी लहरें लहरायीं
मन देवदार की तरह हो ज़िन्दगी को सुनने लगा -
" मैं ज़िन्दगी हूँ
जन्म से मृत्यु के मध्य
मैं सिर्फ जीवन देती हूँ
तहस नहस करना मेरा काम नहीं
छल के बीज भी मैं नहीं बोती
विनाश से मेरा कोई नाता नहीं
मैं तो बस देती आई हूँ ...
अर्थ का अनर्थ
यह तो इंसानी दाव पेंच हैं ...
'इसी जीवन में सब होता है '
ऐसा कहकर इन्सान अपनी चालें चलता है
अपने स्वार्थ साधता है
सबकुछ तोड़ मरोड़कर
बढ़ाकर घटाकर
मायूसी से कहता है
'ज़िन्दगी के रंग ही अजीब हैं .... '
सच तो ये है
कि मेरे पास कुछ भी बेमानी नहीं
हर रंग की अपनी खासियत है
अगर इंसानी मिलावट ना हो ...
मैं तो सिर्फ राहें निर्मित करती हूँ
सेंध लगाना इंसानी फितरत है
किसी और को कटघरे में डालना भी
उसकी सधी चाल है .. .."

अनमना मन अनमना नहीं रहा
उसने बड़े प्यार से ज़िन्दगी के हाथ चूमे
लम्बी सी सांस ली
और मेरे पास आ गया
कहीं कोई सवाल शेष नहीं रहा ....

तो चलो ..... मेरी ऊँगली थाम लो , क्योंकि -

खामोशियों की चादरें
मैंने समेट दी हैं
चलो कहीं शोर करें ...
सो चुकी हैं संवेदनाएं
शिथिल हैं कर्तव्य सारे
चलो जागरण के गीत गायें ...
तय है - लोग बेरुखी से देखेंगे
कड़वे बोल बोलेंगे
बुरा नहीं ,
बहुत बुरा लगेगा
पर बीते दिनों को लौटाने का
और कोई रास्ता नहीं रहा
सोये रिश्तों को जगाने का
कोई विकल्प नहीं रहा ....
परेशान चेहरों की धुंध में
अपने भी बेगाने लगने लगे हैं
कभी पहचान मिले तो
अनजान बन गुजर जाते हैं
वक़्त ही वक़्त है
पर दिल नहीं
चलो एक धड़कता दिल ले आएँ
समझदारी के भारी भरकम चादर से निकलकर
कुछ बेवकूफाना हरकत करें
किसी खोये चेहरे से अकस्मात् पूछें -
'हुआ क्या है ' ...
चलो किसी चेहरे पर विश्वास की रेखा खींचें

अहम् की उपजाऊ धरती पर
दूरी के बीज डालना बन्द करो
इंतज़ार मत करो किसी के आने का
अपनी पुकार उसे दे दो
तरीका भी एक हद तक अच्छा लगता है
तरीके की जकड़न से निजात पाओ
खुलकर हंसो
बिना किसी विज्ञापन के
चेहरा चमक उठेगा ....
खिली खिली धूप में
खुली खुली साँसों में ही वजूद मिलेगा
तो चलो भी !

जब तक जीवन है क्रम है .... शेष , विशेष का क्रम चलता ही रहेगा , तलाश भी बनी रहती है ............... पूर्ण होना यानि मुक्त होना , और इस तलाश में अभी मुक्ति की चाह से प्रबल खुद की तलाश है ................... कुछ और तलाशूँ , तब तक के लिए एक अल्प विराम !!!

23 May, 2012

खुद की तलाश - 14



बन्द कमरे में या सड़कों पर
गुहार लगाती चीखों को
मैंने ठीक उसी तरह
महसूस किया है
जिस दहशत और बचाव की उम्मीद में
वे गूंजती हैं !
सांय सांय सी एक आवाज़
दिल दिमाग में
अंधड़ की मानिंद उठापटक करती है !
तहसनहस मानसिक स्थिति को
सहेजने के क्रम में
मैं कहाँ होती हूँ -
खुद ही नहीं जान पाती !
लहुलुहान अपनी सोच का
कतरा कतरा चुनती हूँ
और बेबस लाचार
सिकुडकर बैठ जाती हूँ ...
तेज तेज साँसों की बेआवाज़ चीखें
और अस्तव्यस्त चेहरा
शुष्क रेगिस्तान में
आसमान देखते हैं
निर्जीव आँखों की पुतलियों में
कोई सुगबुगाहट भी तो नहीं होती
रहती है बुत - पत्थर की तरह !
एक बूंद भी
आँखों से नहीं निकलता
आँखों के समंदर में रेगिस्तान
दूर दूर तक फैला होता है ...

उनकी खातिर न रो सको तो चुप रहो , हंसने से आंसुओं का अपमान होता है ! रेगिस्तान की शुष्कता में भी उनके बेख़ौफ़ इरादे पानी लाने का सामर्थ्य रखते हैं . इन हौसलों को नज़रअंदाज न करो -
उसकी जब्त स्थिति में मौन साथ दो , स्थितियों को हल्का न बनाओ !कौन जाने किस रेगिस्तान में वह प्यास बुझा जाये और जीने का सबब बन जाये .... हाशिये पर कब कौन होगा , कोई नहीं जानता है !

"सत्य और कथा ...

दो अलग पाट हैं जीवन के

अनुमान का जल

न सत्य को उद्भाषित कर पाता है

न कथा के मूल को ... !

लकड़ी की नाव से

इस किनारे से उस किनारे तक जाने के मध्य

जीवन भी है और मृत्यु भी...

न जीवन का वक़्त है न मृत्यु का

तुम्हारी जिजीविषा तुम्हारी चाह

नदी के दोनों पाट पर महल तो खड़े करते हैं

पर महलों में प्राण प्रतिष्ठा हो ही

यह कौन कह सकता है !

किसी सन्नाटे को चीरना यदि आसान होता

तो दर्द का लम्हा घातक न होता ....

खोना ... खोते जाना ...

जीवन चक्र कहो या जीवन सार

!!!

किसने कितना खोया

किसके दर्द का आधार था

कौन सा दर्द निराधार .... कैसे तय होगा ?

...

अपनी बनाई चौखट से

तुम जो भी जोड़ घटाव करो

पर उसकी चौखट के आगे

तुम भी हाशिये पर हो .... !!!"


और जब तुम हाशिये पर होते हो तो तुम सफाई देने लगते हो .... यह जो देते हो , उसे कभी लेने का ख्याल नहीं आया ? कारण, परिस्थिति , समय - कोई एक तो इसका हकदार है नहीं ....
कुछ गलत लगता है तो तभी कहो, जब तुमको सुनना गवारा हो .... वरना बेवजह पंच परमेश्वर बनने की क्या आवश्यकता !

जब हमारे पास कुछ नहीं होता कहने को तो क्या वाकई कोई बात हमारे अन्दर नहीं होती ? होती है बातें - पर कभी हम कहना नहीं चाहते , कभी वो हमारे अन्दर गोल गोल घूमती हैं मंथन की तरह . हम
जहाँ बैठे होते हैं , वहाँ हम नहीं होते .... और जहाँ होते हैं वहाँ की बातें वहाँ नहीं कह सकते जहाँ हम मात्र शरीर के साथ होते हैं . इस अवस्था को हम सब समझ सकते हैं , क्योंकि हम सब इससे गुजरते हैं .
पर भीड़ में यह अजीब सा दिखने लगता है , अपने सच से परे हर कोई प्रश्न उठाने लगता है - ' क्या हुआ ?'
हम इतने मासूम नहीं होते , दरअसल हम खुद को बन्द करके दूसरे को सुनना चाहते हैं और उसे चर्चा का विषय बनाना चाहते हैं ! इस स्थिति से निजात पाने के लिए हम एकांतवास चाहते हैं ...
बहुत ज़रूरी है यह एकांत ! एकांत हमारा मंथन करता है , जकड़न की स्थिति से लड़ता है . इस उठापटक के साक्ष्य सिर्फ हम होते हैं , जो टूटता है उसे हम खुद तोड़ते हैं तो किसी से शिकायत भी नहीं होती . एकांत सही दिशा देता है , फिर हम सहज हो जाते हैं ..... कहाँ गए थे का प्रश्न उठता है ,पर मनःस्थिति का कचरा नहीं होता ....
हमें सहज भाव से यह एकांत देना चाहिए , जबरन थोपी गई सोच भारी होती है और कर्मठ व्यक्ति भी थक जाता है , तो उसे बिना मांगे कोई सलाह देना सही नहीं . मांगने पर भी उसकी सोच को ही समय
देना ही उपयुक्त है . अब इससे अधिक कहूँ भी क्या ? कि ,

बेशक शतरंज की चाल आती है
पर प्यादों से बेखबर
खुद की बेफिजूल गर्वोक्ति में
प्यादों की शह से मुक्ति नहीं ...
बेहतर है अवकाश लो इस खेल से
अन्यथा औरंगजेब के शिकंजे में
दारा की भेंट अनचाहे देखनी होगी !
दीवारों में कहानी
गाइड की जुबानी
यही रह जाती है जिंदगानी
और बरखुदार
तुम क्या थे ,तुमने क्या किया
सब गाइड की मेहरबानी
.....
ऐतिहासिक अवशेष !?
क्या सच क्या झूठ ...
सारे अवशेष आँधियों में उड़ जाते हैं !
....
बंधु समय है
बाँध बांधना सीखो
जो भूख से बेहाल हैं
उनको बिना किसी प्राप्य के
रोटी दो...
प्यादे तुम्हारे क़दमों से लिपट
तुम्हारी सलामती की दुआ मांगेंगे
इससे क्या होगा !...
- इस स्वार्थ से परे
ये करके देखो
जीत हार से परे
बड़ी अच्छी नींद आएगी .......

क्रमशः

22 May, 2012

खुद की तलाश - 13



मैं नाविक हूँ , पतवार बनना चाहती हूँ
मैं नदी से सागर में उतरना चाहती हूँ
जो कुछ भी दिख रहा है
वह अधूरा है
मैं सारे तिलिस्म पार करना चाहती हूँ ...
मृगमरीचिका खुद ही वहम है
जो लग रहा है - वह कहीं न कहीं है !
क्षमताओं के अचूक वाण
भरे पड़े हैं
लक्ष्य हमें साधना है
चयन हमारा है
किसी और के हाथ में दे देना भी
हमारा ही चयन है ....
जब उसे सर्वाधिकार दे ही डाले
तो फिर बहस कैसी
और हर हाल में ज़िम्मेदार तुम हो
कोई और नहीं !
परिस्थितियाँ भी हमारा निर्णय है
..................
यदि हार तय है तो हार होगी
हार -जो हम तुम समझते हैं
मानते हैं !
पर हार के पीछे भी प्रयोजन है
दुर्भाग्य नहीं
.........
दुर्भाग्य की प्रबलता नहीं थी कर्ण की हार
न्याय था पांडव और कौरव का
कारण कितने भी उपस्थित किये जाएँ
कानून की देवी बिना पट्टी के अंधी हो जाए
होता वही है , जिसके आगे कोई रास्ता हो
तथाकथित दुर्भाग्य में भाग्य का ही सूत्र जुड़ा होता है !
......................................................................... जब हम मार दिए जाते हैं तो कारण कोई और होता
है , जब हम दावानल से सही सलामत निकल आते हैं तो हमारा प्रयास ! जो तैराक नहीं होता , वह भी हाथ पाँव मार के बच निकलता है , कुशल तैराक भी तल में निश्चेष्ट हो जाता है - क्यूँ ? सबसे पहली बात कि हमारा हाथ पाँव मारना ज़रूरी है , तिनके को भी हमें पकड़ना होता है , .... पर यदि हम मर गए तो अपनी सोच का तर्पण
अर्पण मत करो . तुम मृत शरीर देख रहे हो , उसके पीछे की उसकी चीख , उसकी गर्जना से तुम वाकीफ नहीं ! अगर ज़िन्दगी आने से पूर्व दस्तक देती है तो जाने से पूर्व भी देती है .... तुमने सुना नहीं , इसका अर्थ यह नहीं
कि वह खामोश चली गई . अनुमान एक संभावना है , सच नहीं .

सोच के देखो

"मैंने तुमसे कहा -
आकाश पाने के ख्वाब देखो
सूरज तो मिल ही जायेगा ...'
जब कभी किरणें विभक्त हुईं
मैंने उनको हथेली में भरकर
सूरज बना दिया ...
मिलने की अपनी सार्थकता होती है
पर क्या नहीं मिला
क्यूँ नहीं मिला के हिसाब का फार्मूला
बहुत जटिल होता है
तुम उसे सुलझाने में
न उसे सुलझा सकते
न पाने की ख़ुशी जी सकते हो !
ऐसे में -
सूरज भी मायूस पिघलने लगता है ...

आकाश परिपूर्ण है - क्यूँ ?
सूरज , चाँद , सितारे , बादल
ये सब मिलकर उसे पूर्णता देते हैं
वरना आकाश के विस्तार का कोई औचित्य नहीं !
खोना -पाना अपने हाथ में नहीं होता
पर खुद को टूटकर भी जोड़े रखना
अपने हाथ में होता है
...
सीखने के लिए प्रकृति का विस्तार है
सृष्टिकर्ता का चमत्कार है
सूरज ...
ग्रहण के पंजे में भी आता है
चाँद सूक्ष्म से पूर्ण होता है
ग्रहण उसे भी लगता है
सितारे टूटते हैं
फिर भी विश पूरा करते हैं
पेड़ को काट दो
फिर भी हरे पत्ते
उसके अस्तित्व को बताते हैं ....
.....
हमारा अस्तित्व है
समय की पहचान
ख़्वाबों की वो धरती
जहाँ आकाश मुट्ठी में होता है - सूरज नए विश्वास का तेज लिए
पास बिल्कुल पास होता है ...
सोच के देखो
एक मासूम मुस्कान तुम्हारे चेहरे पे होगी
क्योंकि सत्य यही है
बस यही है !"

हम सत्य से बेवजह डरते हैं , क्योंकि भय सत्य में नहीं , झूठ के लगाए कंटीले तारों से है .... और झूठ के
व्यापार में एक बार संलग्न हो गए , तो निकलना मुश्किल हो जाता है . अन्यथा हम ही अपने खामोश क्षणों
में कहते हैं -

" कहाँ भटकते रहे मन?
तुम्हारे सारे अर्थ तो तुम्हारे ही भीतर थे,
जो "कस्तूरी" की तरह,
तुम्हारे रोम-रोम में सुवासित थे,
तुम्हारी आँखों में प्रदीप्त थे!
तुम तो व्यर्थ हथेलियाँ ढूँढने में लगे थे,
ठोस हथेलियाँ तो तुम्हारे ही पास थी,
तुम रिश्तों का ताना-बाना बुनने में,
मकड़ी के जाल में फँस गए थे...
रिश्ते भी तुम्हारे ही अन्दर थे!
मेरे मन!
तुमने अपने कई स्वर्णिम वर्ष गँवा दिए,
अब ठहरो,
अन्दर की साज-सज्जा बदलो,
धूल की परतों को झाडो,
करीने से संवार दो...
हाँ,इतनी जगह रखना,
कि, खुली हवा आ जा सके..."

क्रमशः

21 May, 2012

खुद की तलाश - 12



कृष्ण की लीला कहते हो
गीता को उधृत करते हो
पर खाली क्षणों में बैठकर
उल्टे सवाल करते हो

.... राधा अकेली ! तुम कहाँ हो कृष्ण ?

लीला उसकी , रचना उसकी -
फिर कैसा है यह प्रश्न ?

ब्रह्मांड जिसके भीतर हो समाया
गोवर्धन जिसकी ऊँगली पे टिका
द्रौपदी का जो मान बना
अपने विराट स्वरुप में
कुरुक्षेत्र का सत्य दिया
उससे यह प्रश्न
और उसपे शंका
खुद को उसमें कैसे देखा ?
.....
राधा का तुमने नाम सुना
बस नाम सुना
और बैठ गए एक नाम के साथ
पलभर को न सोच सके -
राधा में ही तो मीरा है
सत्यभामा और रुक्मिणी है
राधा ही कृष्ण की है रानी
औ पटरानी भी राधा है
...................................
बांसुरी राधा
राधा बांसुरी
कदम्ब है राधा , यमुना राधा ,
खग है राधा रास है राधा
कृष्ण की हर इक सोच है राधा
गोकुळ राधा
मथुरा राधा
सच मानो - तो कृष्ण भी राधा !
राधा से है कृष्ण बना
तन है राधा
मन है राधा
श्याम वर्ण की रंग है राधा
.................................................. अदभुत दृश्य नहीं यह , तथ्य है - तुमने , हमने कभी सोचा ही नहीं कि कृष्ण अपनी सम्पूर्णता से कैसे अलग हो सकते थे !
................................................ कृष्ण को हम देखकर भी नहीं देखते , और जब तक हमारी प्रवृतियों का पर्दा पड़ा है , हम वही कहते हैं , वही देखते हैं - जो हम हैं . कृष्ण की मानवीय विवेचना में संभव है हम कृष्ण को दोषी बना दें , पर कथ्य कृष्ण को दोषी बना ही नहीं सकते . यदि इतना सरल सहज होता सबकुछ तो तीन श्रेणियां क्यूँ होतीं - धरती आकाश पाताल !
ईश्वर को पाने के लिए , देखने के लिए , पहचानने के लिए परम भक्त होना पड़ता है और जो परम भक्त हुआ , वह खुद ईश्वर होता है . बजरंगबली की भक्ति और उनके देवत्व से हम अनभिज्ञ नहीं . विधि के अलौकिक विधान का एक नज़रिया यह भी है -


"द्रौपदी उवाच -
महाभारत की भूमि का प्रारब्ध मुझे बनाया था कृष्ण ने
उसने सखा हो चयन किया
मैंने सखा होने का साथ निभाया .
यूँ भी नारी बंटती आई है
तो प्रयोजन निमित्त बंटना
सत्य को उजागर करना था ...
5 पांडव नहीं थे पांडू पुत्र ...थे वे क्रमशः इन्द्र धर्मराज पवन और अश्विनी पुत्र
और मुझे कृष्ण ने यह उत्तरदायित्व दिया
कि मैं काल का आधार बनूँ !
... यूँ भी यातनाओं से गुजरती स्त्री
आग में स्वाहा होती स्त्री
गर्भ में ही दम तोड़ती कन्या
काल का निर्णायक आगाज़ होती हैं
हम - खामोश विरोध, आंसू के साथ
इसकी इति समझ लेते हैं
अगर गौर से पन्नों को पलटा जाए
तो सूर्योदय वहीँ होता है ...
........
कृष्ण ने मुझे
कुरुक्षेत्र की भूमि को रक्तरंजित करने का आधार बनाया
सच है ...
पर सच और भी हैं -
कृष्ण के जीवन का आधार कन्या
कृष्ण के बचपन का आधार माँ यशोदा
कृष्ण के प्रेम का आधार राधा
धर्म का नाश ही स्त्री की पीड़ा से है
ये और बात है कि कभी कुरुक्षेत्र
कभी कृष्ण की हथेली
कभी कृष्ण का हुंकार
भूलो मत .....
जब जब धर्म का नाश होता है
कृष्ण अवतार लेते हैं ...
........"

पर जब संशय हो तो अवतार की पहचान कैसे हो ! उसने तो खुद को चहुँ ओर स्थापित कर रखा है , किस रूप में वह उठा है - इसे जानने समझने के लिए हमें संशय्र रहित होना होगा और इसके लिए जीना होगा तो

"सत्य से भाग कर क्या होगा
खुद को उलझाकर क्या होगा
दिल जो चाहता है
वही करो
दिल के आगे कभी हार नहीं होती ...
कारण किसी को मत बनाओ
क्योंकि कोई भी कारण
किसी की प्रतीक्षा नहीं करता

हाँ उस रौशनी पर यकीन रखो
जो तुम्हारे बिना चाहे भी
तुम्हें राह दिखाती है
अनवरत जलती रहती है !

अपने स्व की तुष्टि के आगे
वक़्त जाया मत करो
एहसान से ऊपर
आईने में खुद को देखो
क्या हर एहसान
तुम्हारा अभिमान नहीं है
या खुद को जिंदा रखने का अभियान ?

अक्सर मरे हुओं को पाने के लिए
तुम खुदा को बुत बना देते हो
फिर उसके होने का प्रमाण मांगते हो
सोचो ....
क्या तुम हो ?

तुम तो अप्राप्य के पीछे
प्राप्य से अलग दौड़ लगा रहे हो
खुद को दोष ना देकर
दूसरों को कारण बता रहे हो
हर धागे से खुद को खुद ही उलझाकर
उसे तोड़ते जा रहे हो

...दिल कभी गूंगा नहीं होता
शोर से परे उसकी सुनो
मरने से पहले जी लो ..."

क्रमशः

20 May, 2012

खुद की तलाश - 11



मैं हूँ चिड़ियाँ
कभी बाबुल के आँगन की
कभी साजन के आँगन की
मैं हूँ चिड़िया....

उड़ उड़ जाऊँ डाली डाली
मैं मतवाली मैं मतवाली
कभी बाबुल दिखाए दुनिया
कभी साजन दिखाए दुनिया
मैं हूँ चिड़िया...

चुन चुन करती मैं गुनगुनाऊं
घर की दीवारों से नेह बढ़ाऊं
कभी बाबुल के गीत गाऊं मैं
कभी साजन के गीत गाऊं मैं ...
मैं हूँ चिड़िया .....

लम्बी उड़ान भरूँ
सपने सजाऊं
तिनके चुन चुन
घर मैं बनाऊं
कभी बाबुल दे पंख मुझे
कभी साजन दे रंग
मैं हूँ चिड़िया...

एक लड़की की यही कहानी . उसकी सारी स्वतंत्रता प्यार के पिंजरे में कैद होती है - नहीं इजाज़त उसे पिंजरे की तीलियों पर चोंच मारने की . तीलियों से बाहर निकली तो स्वछन्द ! हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाकर भी वह प्रश्नों के घेरे में होती है या दूसरों की मुहर पर . वक़्त बदला है , अवश्य बदला है - पर न उसके सपने मरे और न उसकी नियति बदली . वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो गई , पर अस्तित्व पुरुष से ही रहा ....... यह मैं नहीं कह रही , यह आज का भी परिवेशीय परिणाम कह रहा है . चाहते न चाहते हुए भी हम आज भी अपनी बेटियों को सहनशील होना सिखलाते हैं - समझ में नहीं आता कि अतीत से डरते हैं या भविष्य से या.... ! हाँ , एक लड़की की संरचना उसे असुरक्षित बनाती है , किसी भी घटना के दुष्परिणाम का दाग उसके माथे लगता है , और यदि वह दाग के व्यूह से निकलती है तो समाज ..... आह ! यह तथाकथित समाज कहता है - स्त्रियोचित गुण है ही नहीं ! स्त्रियोचित गुण - यानि चुप रहो , आँखें नीची रखो . परिवर्तन है .... पर स्पष्ट नहीं !
भूल जाते हैं हम कि ये लड़कियां ख़्वाबों सी होती हैं , और ख़्वाबों की सरज़मीं पुख्ता होती है . आइये मिलते हैं -

ख़्वाबों सी लड़की से

" ख़्वाबों सी लड़की
अक्सर मर जाती है
सच या झूठ -
ये तो वह भी नहीं जानती !
जानेगी कैसे
रूह बन कर चलना
उसका ख्वाब जो होता है ...
रूह बनी लड़की रूहों से प्यार करती है
ख़्वाबों की सरज़मीं पर
रूहानी घर बनाती है
हवाएँ आध्यात्मिक चलती हैं
प्यार समर्पण के गीत गाता है
कोई आए न आए
दरवाज़े खुले होते हैं
.... ख्वाब सी लड़की
सांकलों को भय मानती है
भयमुक्त ख्वाब में वह सांकलें नहीं लगाती
सूक्ष्म से सूक्ष्म ख्याल
गौरैया से मासूम होते हैं
ख़्वाबों की हथेली पर बेफिक्र दाने चुगते हैं ...
बहेलिया सा मन होना तो आम बात है
पर मन को रूह की ऊँगली थमा
प्राकृतिक सृजन करना कठिन है ...
ख़्वाबों के परिधान बमुश्किल बनते हैं
और एक लड़की मुश्किलों में ही राह बनाती है
ख़्वाबों सा प्यार
ख़्वाबों के मंत्र
ख़्वाबों का ध्यान ... उसके हौसले होते हैं !
मरने का गिला नहीं होता
जीने के लिए वह ख्वाब बन जाती है
और न जी पानेवाले रास्तों में
उसे अपने मरने का आभास तक नहीं होता
ख़्वाबों सी लड़की
अंगारों में साँसें ले ही लेती है मरने से पहले ..."

पर उसके कोमल मन को इतना बिंधा गया , दहेज़ हत्या , भ्रूण हत्या , और आए दिन एक अरुणा शानबाग सी ज़िन्दगी कि वे खुद को तलाशने लगीं . एक से बढ़कर एक अग्नि प्रोज्ज्वलित हुई वर्जनाओं की धूरी ! पर ..... एक टुकड़े की मोहताज वह इतनी बार बताई गई कि अंततः उसे रूद्र रूप लेना पड़ा ...

"धू धू जलती बहुएं
दहेज़ की बलि वेदी
लांछनों का सिलसिला
रोटी के टुकड़ों का हिसाब ...
स्तब्ध कई परिवार !
न न्याय, न समाज, न परिवार
बस एक प्रश्न ....
क्या होगा फिर !
और मौन स्वीकृति - मृत्यु !
....
एक नहीं दो नहीं ....
अनगिनत बेटियों के ख्वाब
दहेज़ की आग में स्वाहा हो गए
भय का अनकहा साम्राज्य
समाज में सिसकियाँ लेता रहा
तब---हाँ तब
लड़कियों ने अपनी ज़मीन को
अपने ज़मीर को अहमियत दी
हर क्षेत्र में अपना सिक्का जमाया
कम हो गया भय बेटी होने का
फख्र हुआ बेटीवालों को
सर उंचा करके सब कहने लगे
'यह हमारा बेटा है....!'
यानि बेटियों की जीत
उनके 'बेटा' कहलाने का ठोस प्रमाण बनी ...
.....
इस प्रमाण पत्र को पाने की चाह में
लड़कियों की 'मासूमियत' खो गई !
(मासूम लड़की आगे बढ़ ही नहीं सकती )
अधिक सबल बनने की ख्वाहिश लिए
लड़कियाँ घर से दूर हो गईं ......
शिक्षा और शारीरिक संरचना -
दो अलग आयाम हुए
घर से दूर
दो अलग मुकाम हुए !
............
घर से दो कदम की दूरी पर
जब वहशी आँखें पीछा करती हैं
अश्लील बोल लहू गर्म कर जाते हैं
तो भाई से दूर
पिता से दूर
माँ की ममता से दूर
ये लड़कियाँ....
!!!
लगभग सबने
अपनी घबराहट अपने भय को
उच्चश्रृंखल अंदाज बना लिया
बनाया एक दोस्त ...
यहाँ तक कि लिविंग रिलेशनशिप को
कानून बना देने को बाध्य किया !
.....
आलोचना की कुर्सी से उठो
न्यायकर्ता का का चोगा उतारो
और संवेदनशील होकर सोचो ...
तभी जानोगे
भय ने इन लड़कियों को
जिस तिस का हाथ थाम लेने को
विवश कर दिया है !
सड़क का अँधेरा
और भयभीत धड्कनें ...
दरिंदों से बचने का
सुगम उपाय ढूंढ निकाला है .....
.....
देखा था इन लड़कियों ने
अपनी माँ का हश्र !
सहमी आँखें
आंसुओं के सूखे निशान
और थरथराते कदम ...
विवाह ने एक भय भर दिया उनमें
चाहे अनचाहे
वो लड़कों को तौलने लगीं ...
समाज !परिवार !न्याय !
विशेष रूप से महिलाएं !...
ज़िम्मेदार हैं मर्यादाओं के हनन का !
...
अनिच्छा से पत्नी का दायित्व निभाती महिला को
सबने सीख दी
पर खुली हवा नहीं दी !
पत्नी की मौत
पति का ब्याह ... कभी गलत हुआ नहीं
पर ज़ुल्म का विरोध
स्त्री की धृष्टता बन गई !
....
सरेराह उठाकर ले जाई लड़की के लिए
प्रत्यक्ष गवाह का प्रश्न उठा
बेरहमी से अन्याय सहती स्त्री के आगे
'क्यूँ?' का प्रश्न उठा ....
न्याय के नाम पर अर्जियां पड़ी रहीं
उम्र बीतती गई
प्रश्न उठते रहे
एक ही कहानी- दोहराने की भी हद होती है !
...
नई पीढ़ी ने
हर तथाकथित मर्यादाओं को ताक पर रख दिया
और भीड़ में गुम हो गई !
कभी देखा है -
अपने अस्तित्व के लिए
अपने टुकड़े के लिए
रात दिन एक करती ये लड़कियाँ
जब रात के सन्नाटे में
अपने कमरे में होती हैं
तो इनकी आँखों में कोई सपना नहीं होता !!!" ख्वाब सी खूबसूरत लड़की को हमने खो दिया !

क्रमशः